पावागढ़ मंदिर का इतिहास | जानें मंदिर का रास्ता और इससे जुड़ी रहस्यमई बातें

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पावागढ़ मंदिर का इतिहास

अगर आपको पावागढ़ मंदिर का इतिहास, इस मंदिर तक पहुंचने का रास्ता और इससे जुड़ी कुछ अहम बातें जाननी है तो यह पोस्ट आपको अंत तक पढ़ना चाहिए।

भारत के हर राज्य में घूमने के लिए कोई ना कोई स्पेशल जगह अवश्य होती है, जिसमें से कुछ जगह हम इंसानों के द्वारा बनाई जाती है तो कुछ जगह पहले से ही बनी बनाई है। बात करें अगर पावागढ़ मंदिर की तो यह गुजरात राज्य के चंपानेर के पास स्थित है और आपको यह जानकर भी अत्यंत प्रसन्नता होगी कि गुजरात में स्थित इस पावागढ़ मंदिर को यूनेस्को ने वर्ल्ड धरोहर प्लेस के तौर पर घोषित किया हुआ है।

यहां पर पहुंचने के लिए आपको काफी आसानी होती है क्योंकि यहां से रोड, रेल और एयर ट्रांसपोर्ट की कनेक्टिविटी बहुत ही अच्छी है। आज के इस आर्टिकल में हम पावागढ़ मंदिर का इतिहास जानेंगे साथ ही यह भी जानेंगे कि पावागढ़ मंदिर कहां है।

पावागढ़ मंदिर का इतिहास

बता दें कि जब देवी सती अग्नि में जली थी तब उनके पैर का जो अंगूठा था, वह यहीं पर आकर के गिरा था। इस प्रकार से यह 1 शक्तिपीठ भी है, जो पावागढ़ की पहाड़ी पर मौजूद है। इस पहाड़ी पर आपको सबसे ऊपर की साइड में माता कालिका का मंदिर मिलता है, जहां पर रोजाना लाखों लोग दर्शन करने के लिए आते हैं।

यहां पर जाने के लिए आप सीढ़ियों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं अथवा आप रोपवे के जरिए भी मंदिर तक पहुंच सकते हैं। बता दे कि पावागढ़ का मंदिर दो मंजिला बनाया गया है जिसमें नीचे वाले हिस्से में काली माता की मूर्ति स्थापित है और ऊपर वाले हिस्से में मुस्लिम समुदाय के लिए भी एक स्थल बनाया गया है।

गुजरात की पावागढ़ पहाड़ी

आज से लगभग 10-12 साल पहले पावागढ़ पहाड़ी पर चढ़ना काफी मुश्किल था क्योंकि इस पहाड़ी के चारों तरफ काफी गहरी गहरी खाई थी जो कि वर्तमान के समय में भी मौजूद थे, परंतु गवर्नमेंट के प्रयासों के फलस्वरूप अब आप सिड़ियों की सहायता से और रोपवे की सहायता से पावागढ़ पहाड़ी पर जा सकते हैं। बता दें कि पावागढ़ पहाड़ी का इलाका 3,280 एकड़ में फैला हुआ है। यहां पर आपको रात के समय में कई जंगली जानवर भी दिखाई देते हैं जिसमें से कुछ जानवर हिंसक होते हैं।

जब आप पावागढ़ की पहाड़ी के पास पहुंचते हैं तब आपको यहां पर वनराज चावड़ा के द्वारा बनाया हुआ चंपानेर शहर दिखाई देता है और यहीं से आपको पावागढ़ की पहाड़ी स्टार्टिंग होने का बोर्ड भी दिखाई देता है। यहां से माची हवेली जाने के लिए आपको 1471 फीट की ऊंचाई तय करनी होती है।

माची हवेली पर पहुंचने के बाद आपको रोपवे की सुविधा मिलती है और अगर आप सिढियों की सहायता से कालका माता के मंदिर पर जाना चाहते हैं तो आपको 250 सीढ़ियां चढ़नी होती है।

सिढियों की सहायता से या फिर रोपवे की सहायता से जैसे जैसे आप आगे बढ़ते जाते हैं, वैसे वैसे नीचे की चीजें आपको काफी छोटी दिखाई देने लगती है। बरसात के मौसम में या फिर ठंडी के मौसम में धुंध होने के कारण आपको नीचे की चीजें काफी हल्की दिखाई देती हैं। इसके अलावा ऊंचाई पर पहुंचने के बाद आपको नीचे का नजारा बहुत ही बढ़िया दिखा देता है।

आपको दूर-दूर तक ऐसा दिखाई देता है जैसे कि जमीन और बादलों में कोई अंतर ही नहीं है। अगर आप सिढियों के माध्यम से ऊपर जाते हैं तो आप एक से डेढ़ घंटे में कालका माता के मंदिर पहुंच सकते हैं। हालांकि यह आपकी स्पीड के ऊपर भी डिपेंड करता है कि आप कितना तेज गति के साथ चलते हैं।

अधिकतर जो बुजुर्ग लोग यहां पर आते हैं, उन्हें रोपवे की सहायता से ही ऊपर ले करके जाया जाता है क्योंकि बुजुर्ग लोग इतनी अधिक सीढ़ियां चढ़ने में सक्षम नहीं होते हैं। सीढ़ियां चढ़ने के दरमियान आपको खाने पीने की विभिन्न चीजें सिढियों के अगल-बगल लगी हुई दुकानों में दिखाई देती है। इस प्रकार आप आराम कर के मंदिर तक पहुंच सकते हैं।

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पावागढ़ कालिका मंदिर का इतिहास

इस मंदिर के इतिहास के बारे में बात करें तो एक बार दक्ष प्रजापति नाम के राजा ने एक हवन का आयोजन किया था और इस हवन में शामिल होने के लिए उन्होंने सृष्टि के सभी देवी देवताओं को न्योता दिया था परंतु उन्होंने जानबूझकर के अपनी बेटी के पति यानी की शंकर भगवान को हवन में आने का न्योता नहीं दिया, साथ ही उन्होंने अपनी बेटी को भी हवन में आने का न्योता नहीं दिया।

परंतु जब माता पार्वती जी ने जिद किया तब शंकर भगवान उनकी जिद के आगे झुक गए और वह बिना निमंत्रण के ही दक्ष प्रजापति के द्वारा आयोजित किए जा रहे यज्ञ में शामिल होने के लिए पहुंच गए, जहां पर पहुंचने के बाद उनका दक्ष प्रजापति के द्वारा काफी अपमान किया गया।

और यही वजह है कि माता सती अपने पति के अपमान से काफी दुखी हुई और उन्होंने गुस्से में आकर के अपने प्राण छोड़ दिए, जिसके बाद सती की मृत्यु को देखकर के शंकर भगवान गुस्से से आगबबूला हो गए और सती की बॉडी को अपने हाथ में लेकर के उन्होंने तांडव करना चालू कर दिया और पूरे ब्रह्मांड में यहां से वहां जाने लगे।

शंकर भगवान के इस तांडव को देख कर के सभी देवी-देवता काफी भयभीत हो गए और सभी को यह लगने लगा कि अब सृष्टि का विनाश तय है परंतु तभी कुछ देवी देवता भगवान विष्णु के चरणों में गए।

इसके बाद विष्णु भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र को माता सती की बॉडी के टुकड़े करने के लिए भेज दिया और सुदर्शन चक्र ने अपना काम करते हुए माता सती की बॉडी के कई टुकड़े किए और इस दरमियान माता सती के कपड़े, अंग और गहने जहां जहां पर गिरे वहां वहां पर आगे चलकर के शक्तिपीठ अपने आप स्थापित हो गए।

माता सती के टोटल 52 शक्ति पीठ भारत और आसपास के इलाके में स्थित है। पाकिस्तान में स्थित माता हिंगलाज का मंदिर भी 52 शक्ति पीठ की लिस्ट में ही आता है और पावागढ़ पर स्थित माता कालिका जी का मंदिर भी 52 शक्ति पीठ की लिस्ट में ही जाता है। शक्तिपीठ होने के नाते यह जगह हिंदुओं के लिए बहुत ही महत्व रखती है और यही वजह है कि यहां पर स्थापित दक्षिण मुखी काली देवी जी की मूर्ति के दर्शन करने के लिए हर साल भारी मात्रा में लोग आते हैं।

इसके अलावा आपको यह भी बता दें कि इस मंदिर में जो मूर्ति स्थापित है, वह दक्षिण मुखी है और यही वजह है कि तांत्रिक पूजा में भी इस मूर्ति का काफी ज्यादा आवाहन या फिर इस्तेमाल किया जाता है।

पावागढ़ के मंदिर के अंदर आप जब जाते हैं तब आपको वहां पर टोटल 3 प्रकार की मूर्तियां दिखाई देती हैं जिसमें सबसे बीच में माता कालिका जी की मूर्ति है, दाएं तरफ काली जी की मूर्ति है और बाएं तरफ बहुचर माता जी की मूर्ति है।

दशहरे के समय में यहां का नजारा देखने लायक बनता है। वर्तमान की गवर्नमेंट के द्वारा यहां पर कई प्रकार की व्यवस्थाएं भी की हैं। आपको रास्ते में पानी पीने के लिए भी कई व्यवस्थाएं मिल जाएंगी। जब आप मंदिर के एकदम पास पहुंच जाते हैं तब आपको वहां पर पूजा सामग्री खरीदने के लिए भी बहुत सारी बड़ी-बड़ी दुकानें दिखाई देती हैं। नीचे से ऊपर सामान लाने के लिए यहां पर गधों का इस्तेमाल किया जाता है, साथ ही साथ कुछ लोग रोपवे का इस्तेमाल करके भी अपने सामान को ऊपर लाते हैं ताकि वह ग्राहकों को अपना सामान बेच सकें।

इस मंदिर के बारे में ऐसा कहा जाता है कि यह मंदिर या तो 10 वीं शताब्दी में बनाया गया होगा या फिर 11वीं शताब्दी में बनाया गया होगा। इसके अलावा आपको यह भी बता दें कि पावागढ़ के आसपास के इलाके में यह मंदिर सबसे पुराना माता कालिका जी का मंदिर माना जाता है। नवरात्रि के मौके पर यहां पर झालरों से पूरे मंदिर को सजाया जाता है, साथ ही गरबे का आयोजन भी यहां पर होता है, जहां पर लोकल लोगों की भीड़ गरबे के आयोजन में भाग लेती है।

यह जगह धार्मिक नजरिए से भी काफी अच्छी मानी जाती है साथ ही यहां पर आप पिकनिक मनाने के लिए जा सकते हैं। पावागढ़ मंदिर के अलावा आपको यहां पर पावागढ़ पहाड़ी, सदन शाह पीर दरगाह, केवड़ा मस्जिद जैसी अन्य जगह भी घूमने के लिए मिल जाती हैं।

पावागढ़ के समीप मुख्य स्थान 

जैन मंदिर

पावागढ़ की पहाड़ियों पर आपको कुछ ऐसे जैन मंदिर भी देखने को मिल जाते हैं जो 400 साल से लेकर के 500 साल पुराने माने जाते हैं। जैन धर्म के लोगों का यह मानना है कि इस्लामिक राजाओं के आने के पहले इस पहाड़ी पर भारी मात्रा में जैन मंदिर पाए जाते थे परंतु बाद में उन्हें तोड़कर के इस्लामिक राजाओं के द्वारा उन्हें मस्जिद का आकार दे दिया गया।

इसके अलावा यहां पर कुछ ऐसे शिलालेख भी मिले हैं जिसमें यह बताया गया है कि यहां पर भील जैसे कबीले भी रहते थे और यह मंदिर उन्होंने ही बनाया था।

तालाब

पावागढ़ की पहाड़ी पर जब आप चढ़ने लगते हैं, तब आपको छोटे-मोटे तालाब भी दिखाई देते हैं जिसमें लोग स्नान करते हुए आपको नजर आते हैं। इसके अलावा आगे बढ़ने पर आपको दोनों साइड ऐसी दुकानें भी मिल जाती है, जो पूजा की सामग्री और देवी देवता की फोटो बेचने का काम करते हैं।

इसके अलावा आपको यहां पर गर्मियों के मौसम में गन्ने का रस और ताड़ी बेचने वाली दुकानें भी मिल जाती हैं, जहां पर आप आराम कर सकते हैं और नाश्ता पानी करके वापस से आगे बढ़ सकते हैं, साथ ही साथ मंदिर के पास पहुंचने पर आपको कई प्रकार के स्टूडियो मिल जाते हैं, जहां पर आप अपनी फोटो खिंचवा सकते हैं।

अगर आप इस पहाड़ी पर जाने का पूरा मजा लेना चाहते हैं तो आपको सिढियों के जरिए ही इस पर जाना चाहिए। हालांकि इसमें आपको थोड़ा समय लग सकता है परंतु अगर आपके अंदर संयम है तो आप ऐसा कर सकते हैं।

पावागढ़ मंदिर जाने का सबसे अच्छा समय

पावागढ़ मंदिर जाने के सबसे अच्छे समय के बारे में बात करें तो यहां पर जाने का सबसे अच्छा समय हल्की ठंडी या फिर फरवरी का महीना होता है, क्योंकि इन महीनो में तापमान सामान्य होता है। इसीलिए आप आसानी से यहां पर जा सकते हैं।

अगर आप गर्मी में यहां पर जाते हैं तो आपको भीषण गर्मी का सामना करना पड़ सकता है और हो सकता है कि आपको थकान भी महसूस होने लगे। इसीलिए जब भी आप यहां पर जाने का मन बनाए तब याद रखें कि आपको फरवरी और मार्च के बीच में यहां पर जाना है या फिर हल्की बारिश होने के पहले आपको यहां पर जाना है अथवा आप चाहें तो अक्टूबर के महीने में यहां पर जा सकते है।

पावागढ़ महाकाली मंदिर दर्शन समय

यहां पर दर्शन करने का समय सुबह 5:00 बजे चालू हो जाता है और यह सिलसिला लगातार शाम को 7:00 बजे तक चलता है। हालांकि कुछ कंडीशन में इस टाइमिंग में गड़बड़ी हो सकती है। माताजी का यह मंदिर पूरे साल जाने के लिए खुला रहता है और इसमें इंटर करने के लिए आपके ऊपर कोई भी प्रतिबंध नहीं लगाया जाता है।

पावागढ़ महाकाली मंदिर की आरती का समय

यहां पर माताजी की आरती सुबह एक बार 5:00 बजे की जाती है और उसके बाद उनकी आरती शाम को 6:30 बजे के आसपास की जाती है।

पावागढ़ मंदिर कैसे पहुंचे?

यहां पर जाने के लिए आप सीधा बड़ोदरा रेलवे स्टेशन पर उतर सकते हैं और वहां से लोकल साधन के जरिए आप इस जगह पर पहुंच सकते हैं। अगर आप बस के जरिए यहां पर आना चाहते हैं तो आप बड़ोदरा या फिर गोधरा से बस के जरिए यहां पर पहुंच सकते हैं। अगर आप हवाई जहाज से यहां पर आना चाहते हैं तब आप बड़ोदरा एयरपोर्ट पर उतर सकते हैं और वहां से लोकल साधन लेकर के यहां पर आ सकते हैं।

निष्कर्ष ~ पावागढ़ मंदिर

तो साथियों अब आपको पावागढ़ मंदिर का इतिहास और इस मंदिर से जुड़ी कई सारी जानकारी मिल गई होगी। पोस्ट पसंद आया है तो इसे शेयर भी जरूर कर दें

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